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निबन्ध– दाई

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राजेन्द्र कठरिया

पहलमानपुर, २ पुष ।। भगवान के अनमोल देन, माया प्रेम आउ स्नेह के खानी आउ लरकान तहिन सबति सुरक्षित जगह गोदि रहल दाई, सायद भगवान सक्कु ठाउँमे अपने नाई पुगे सिकके होई दाई मनैक रचना करल हुईहिं । लरका जलम लैके मनकेक सिखना पहिला शब्द है दाई । दाईक महत्व वहके ज्यादा पता रहत होई जेहका बचपन दाई बाबा बिना बितल रहता । दाई हि सबका पहिला शिक्षक आउ भगवानके दुसरा रुप आहें । दाई हि लरकन तहिन सारा संसार रहतियाँ तभिमारे दुख कष्टमे सबति पहिले सबके दाईक याद अइता ।

मनैके मरनाते हजार डगर होई सिकता मुल ई धरतिमे जलम लेहना एक मात्र माध्यम आहे उ आहे दाई–बाबा । सब कुछ किने मिलता मुल जतरा धन खर्च करो दाई–बाबा नाई किने मिलता । आउर सम्बन्ध बनावटी होई सिक्ता मुल दाईक सम्बन्ध बिरकुल निस्वार्थ रहता । ई संसारमे दाई–बाबा मात्र अइसन मनै रहतियाँ जौन चहतियाँ कि मोर लरका महति ज्यादा प्रगति करे आउ नाम कमाबे । जेहका ति ममतामय दाई–बाबा रहतियाँ उ कबुफेक गरिब नाई रहता काहिकि वहका अपना दाई–बाबा ति पाइल मजा संस्कार हि वहका धन रहता जेहका भरमे उ अपना सुखमय जिवन ब्यतित करे सिकता ।

आज हमरे जा होई ई हम्मर दाई बाबाके देहल खुबसुरत उपहार है । कल्ह जाके हमरे जा बनब उ हमरे अपना दाई–बाबा वहके देहना उपहार रहि अब हम्मरे अपना दाई–बाबा वहके का उपहार देहना ई हम्मर हातमे आहे । संसारमे सबति बहुमुल्य कुछ चिज है कहलेति उ है हम्मर दाई–बाबाके पसिना जौन हम्मर सुन्दर भबिष्य के तहिन हरेक दिन बहत रहता । तभिमारे फेक दाई–बाबा ति बडा सम्पति कुई दुसरा नाई होई सिक्ता । चाहे हमरे अपना दाई–बाबाके जतरा सेवा करी मुल वोइन लगाईल गुन के रिन कबु नाई चुक्ता करे सिकब ।

जब लरका जवान हुइजितियाँ तौ दाई–बाबा लरकन खुसिके तहन वोइन बेह करदेहतियाँ । मुल जब लरका अपना जिवन संगिनि पैतियाँ तौ अपना सबकुछ अपना अरधाँग्नी पर समर्पित करदेहतियाँ आउ अपना दाई–बाबा ति दुर हुईजितियाँ । वहके पता नाई रहता कि उ ते अपना दाई–बाबा बिना खुसि रहे सकि मुल दाई–बाबा वहका बिना खुसि रहे नाई सकतियाँ । मौसम बदलता, समय बदलता मुल नाई बदलता तौ दाई मनैक माया आउ प्रेम । जब लरका छोट रहतियाँ आउ खेले जैतियाँ तौ दाई मनै चिन्तामे रहता आउ असरा दिखता कि मोर लरका कब खेलके आई ? जब लरका बडा हुइतियाँ आउ पढे जैतियाँ ता फेक दाई मनै चिन्तामे रहता आउ असरा दिखता कि मोर लरका पढके कब आई ? आउ जब लरका जवान हुइजैतियाँ आउ काममे जैतियाँ तौ फेक दाई मनै चिन्तेमे रहता आउ असरा दिखता कि मोर लरका काम करे गेलआहे कब आई ? यदि दाई–बाबा खाली गोर नेगत आहें कहलेति लरका चाहे जतरा सुटबुट आउ टाईमे घुमे वहका कुई अर्थ नाई रहता ।

मुल मनै अब धन कमैनामे अतरा ब्यस्त हुई गेल आहें कि अपना दाई–बाबा वहके सम्झेक् तहिन मदर्स डे आउ फादर्स डे सेलिब्रेट करना आउ एक दिन के तहिन समाजिक संजालमे अपना दाई–बाबाक फोटु डारके ओइन सम्झना परिपाटि बनालेहले आहें । का एक दिन समझके हमरे अपना दाई–बाबा प्रति अपना जिम्मेवारि पुरा करेसिकब ? दुखके बात ते ई है कि समाजमे बृद्धा आश्रम के संख्या दिनहुँ बढ्ति जाईत आहे ।

लेखक कठरिया सन्देश डटकमके प्रकाशक, सम्पादक हैं ।

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