कठरिया सन्देश

१९ फाल्गुन २०८०, शनिबार

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  • चलो चली बैला बचाई

    चलो चली बैला बचाई
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    समय जेदे परिबर्तनशिल है, आज जैसन समय चलत है ऊ कब कैसे बदल जाई सोंचे तक्का नाई सकमिलता । पहिले जैसे हम्मर पुरखा भर पसपरोहन, चिरैंचुरुङ्गनके डरका खुब बैला बचामे तभी जाके खेत महका अनाज पामे । यहका मतलब खेतम होइल धान, गेहु“, जुन्हीं, चाना, मटरा आउ फेक अनाज बचाईक ताहिन पहिले बैला बचाइना बहुत जरुरी रहे नहित कब भुखे मरे परि कहना पता नाई रहे । उसिहीं कुइ फेकुन जात ओहके चिन्हैना सबती बन्ना सम्पति हे भाषा संस्कृतिक पहिचान । उहि नाइ हैत कुछ फेक नाई हे कहनामें दुइमत नाई हे । आजतकके इतिहासमें जौन जात अपना भाषा संस्कृति जुगैले (बैला बचैले) हैं उहि जात दुइ खड्ढी उप्पर चढल है ।
    कल्हके दिनमें रात दिन नाई कहिके आ“टी आ“टा डार डुरके हम्मर पुरखाभर बैला बचैनें उहिक फलस्वरुप आज खेत है आउ खेती । उस्नही पहिले खेतीपातीम पसपरोहन आउ चिरैंचुरुङ्गनके डर रहे मुल अब संस्कृति बचाईक सबती जेदा मनैन डर देखा परता । कुछ समय यह“र कठरिया भाषा संस्कृतिमे दा“न्द सुरु होइ लागल हे । अडोसी पडोसीभर हम्मर अनाज चरे लागल है जहका कारणती हम्मर पेटक चुगहा छिनेछिने करत है । ऐसन बखतमें सबकुई हाथमें हाथ मिलाके, का“धामें का“धा मिलाके अक्के ढिकुला होके हम्मर भाषा संस्कृतिक पहिचानके बैला बचैना जरुरी है । नाहित खेत खबाके झु“का डारके का मिली ?

    टिआर कठरिया
    घोडाघोडी न.पा. ११ सिसैया

    सुचना तथा संचार मन्त्रालय,
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    पान नं.: 6026465656565656565

    ब्यवस्थापक :- अर्जुन कठरिया

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    प्रधान सम्पादक :- टिआर कठरिया

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