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गाेंगा खेललके माेर बाल्यकालके स्मरण

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राजेन्द्र कठरिया, पहलमानपुर, १९ असार ।। असाढ महिनाके दुसरा पाख रहलहाेई, गाउँक सब मनै अपना अपना अंँगना मे खटिया बिछाके सितलाइत रहें । उजेरि रात रहे बदरी नाई लागल रहे तभिमारे जाेन्हाक उजियर मे महतान घरका आगे तीन डनगरीमे हम्रे गाउँक लरकाभर छुइकछुवा खेल खेलतरहि । तब मै सायद आठ नाैं सालके रहलहुइमु ।

मै फे उही झुण्ड मे खिलना मे मस्त रहुँ । उ समइ हमके दुनियाँदारी ती कुई मतलब नाई रहे । दाेसर घइन गाउँक मनै खास करके घरका किसनमा खेतिपतिक बातके चिन्ता लैके परेशान रहें । असाढ महिना के दुसरा पाख लागगिला मुल बैठाैनि शुरु नाई हाेपाइल रहे, काहिकी अभेतक मेघा ( पानी ) बरसना कुई छाँटकाँट नाई रहे । सब मनै अकाशे पानी के असरामे रहें ।

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किसनमा मनैक चिन्ता यी रहे कि कब मेघा आई आउ कब मै बैठाैनी लगइम ? मेघा नाई आइ तउ मै कैसे अपना बाल बच्चा पल्मु ? कैसे कर्जा चुकैमु ? कैसे अपना घरकान तहनि जरावर लेहमु ? कैहके । उ समयमे खेतिपाति पुर्णरुपति अकाशे पानीमे भर परे । एक दुई ठउँ छाेडके कहुँ फेक बाेरिंग नाई गडल रहे । न ते उ समयमे गाउँक मनैनति खेतिपाति बाहेक आय आर्जनके अउरे कुई डगर रहे ।

तबके समय मे पानी बर्षाइक तहनि भगवान पर आस्था आउ बिश्वास करना बाहेक अन्य उपाई जेदा कुछ नाई रहे । तबके मनै परम्परागत रुपमे सजना आउ बैरासु गित गइना, मेहरुवा आउ लाैडियाभर लाेग मनैन पईन्ट बुक्सट पैंधके फुला लाेरे जइना, जिठ्बा मनै छुटकनिया मनैन पानी खुरैना, घरका दाेर सुधे उसार खाेदे जइना आइसनहि लरकाभर गाेंगा खेल खिलना जैसन तमान चलन चलैले रहें ।

हमरे फेक पानी नाई बरसता तउ गाेंगा खिलबाे तउ पानी बरसता कहिके सुनले रहि । छुइकछुवा खिलती खेलत लरकाभर चलाे गाेंगा खेली कहिके सल्लाह बनगेल । कुछ लरका हमती बन्ना रहें ओइने अगडिया बन्ने । गाेंगा खेलेक तहनि कुछ लरका बेंग (मिड्का) बनेक परता आउ जम्मा कपडा निकारके नंगा हाेईक परता, एकदुई जना गाेंगा खेलल घर्ती चाउर, तेना, नाेन, मिर्चा, तेल उगाहके बुकैया आउ दुईतिन जना बेंग बनैया लरकाभरिन कपडा, चप्पल बुकैया रहतियाँ ।

रातिक लगभग नाै बजगेल रहलहाेई, महतान घरति गाेंगा खिलना शुरु करना सल्लाह हाेइल। कुछ लरका बेंग बनने, मै फेक बेंग बननु आउ अपना कट्टु, बनेनी आउ चप्पल निकारके बुकैया लरकन देहली आउ महतान अँगनामे जाके लेंभे लगली आउ गाेंगा …गाेंगा कैहके चिल्लाई लगली, घरका मनै एक एक बाल्टी करके दुई बाल्टी पानी लाके बेंग बनल लरकन उप्पर डार देहने , बेंगभर आउ जाेर जाेरति गाेंगा …गाेंगा कैहके चिल्लाई लगली आउ जिलबुल अँगनामे खुब लिंभली।

Jay Bajrang

यी क्रम कुछ देरतक चलल तब तक सिधा उगैहया लरकाभर सिधा उगाहने । जब सिधा मिलगेल तउ दाेसर घरे जाके अँगनामे लेंभे लगली । गाेंगा खिलना क्रम सिसैया गाँउक बड्का पुरुवा भर सबका घरे पाला नाई पुगतसम जारी रहल । गाेंगा खेलेबिरिया एक बात जननु कि सबका घरका अँगना आउ अँगना के माटि फरक फरक रहता । कुहिक घरका माटि बन्ना जिलबुल रहे आउ गाेंगा खेलत बन्ना मजा लागे, कुहिक घरका अँगनाके माटि बन्ना कररा आउ काँकड ओला खरखर रहे, गाेंगा खेलेबिरिया बेढम गडे, कुहिक अँगना बराेबर आउ कुहिक अँगना बन्ना खल्हाडँगा रहे ।

अईसनहि गाेंगा खेले बिरिया कुइ कुइ घरका मनै बाट्री बारके लाईट लगादेहें तउ हमके चिन्ह नपामे कहिकि बेंग बनैया दाेसर लरकनमे खुस्टेक परे । अब लगभग रातिक गेरा बजेलागल रहलहाेई पधनान आउ डुकराहन घर गाेंगा खेलके पाला पुगैना बाँकि रैहगिला । संयाेग कहुँ या गाेंगा खिलबाेत पानी बरसता कहना लरका भरिन निस्वार्थ भावति करल बिस्वास आउ आस्था, पाछे घइनती करिया बदरि उमडेलागल रहे ।

गाेंगा खिलैया सब लरका बहुत खुशी आउ दंग रहें । बाँकि रहल दुई तीन घर पाला पुगाईत पुगाईत बदरी करिया घनघाेर रुपति लागगेल रहे । हम्रे सक्कु घर हाली हाली पाला पुगैली आउ बम्बुमे खाेरके उगाहल सिधा डुकराहन घर धरके अपना अपना घरे सुते चलगिली । भिनहिक जब मै उठनु तउ झिमझिम झिमझिम पानी बरसत रहे । गाेंगा खेलके सक्कु काम अभे पूरा नाई हाेइल रहे । मिड्का आउ मिड्कीक बेह करना आउ बेह खैना अभे बाँकी रहे । हम्मर उत्साह बहुत जेदा बढल रहे । पानी बरसना थाेरि कम हाेइल तउ डुकराहान घरका अँगना मे उगाहके लाइल सिधाक भात आउ तेना पकैली ।

बिच बिचमे पानी बरसे लागे तभिमारे मिथाैरा ओढके मुस्किलति खाना पका पैली । तले आउ जाने एक मिड्का आउ एक मिड्की पकरके लैके अइने तउ टीका आउ फुलाके माला लगाके ओइन बेह करली आउ छाेड देहली । मिड्का मिड्किक बेह करके सबजाने लदियामे खाेरे गइलि । खारे बिरिया फेक सक्कु जाने कपडा निकारके नंगा खाेरेक परना नियम रहता । यी बात गाउँक लाैडियाभर पता पाईगेल रहें ।

हम्मर आगे लाैंडाभर दिनके कैसे खुरतियाँ अच्छा एइन शरम लगबाइब कहिके लाैंडियाभर लदियक कटाैवा मे आके बैठल रहें । हमरे फे का कम कट्टु पैंधके लदियामे कढेउँ तक पानीमे जाके कट्टु निकारके खुरली आउ उहीँ कट्टु पैंधके बाहिर निकर गिली । लाैंडियाभर खिस्स हाेके दिखती रैहगिने । तब खाेरके आके पकाइल भात आउ तेना सब जाने बेह के रुपमे खैली आउ अपना अपना घरे आइगिली । लरकाभर पानी बरसैने कहिके गाउँक मनै हम्मर उपर बन्ना खुश रहें ।

अब के समय पानी सिंचाई करना तमान कृतिम साधन हाेइल कारण ती आउ समय सँगे पुरान परम्परा आउ आस्थामे परिवर्तन आइल कारणति अइसन रितिरिवाजके खासे महत्व नाई रइहगेल हे । आज असाढ महिना आधा हाेई जाइलागल मुल अभे फेक पानी नाई बरसल । पानी बिना बहुत किसान चिन्तित हैं । माेहके अपना गाेंगा खेलल के दिन याद आइल तभि मै अपना बाल्यकालके स्मरण कुछ लाइनमे गुँथके सबका आगे धरना काेसिस करले हाैं ।

लेखक कठरिया सन्देश पत्रिकाके प्रकाशक, सम्पादक हैं ।

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