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कठरिया समुदायमे सावनके डोला (झुला) के महत्व

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अर्जुन कठरिया, ८ साउन ।। सावन के झुला / डोला एक पारम्परिक उत्सव आहे । इ उत्सव पारम्परिक रुपमें कठरियाभर प्राचीन समय ति आयोजन करति आइत आहें । कठरिया झुला/डोला एक विसेस पहिचान बोंकल उत्सव हे जो एक पाखभर डोला डोल के मनाइल जइता ।

इ सावन डोला खास करके सावन महिनाक बुड़ा (शुक्लपक्ष) प्रतिपदा ति लइके तृतियाक दिन तक डारल ज़इता । इ सावन के डोला डरना के खास कारन बरखा के बुवारू धान बो-बा के फुरसत रहल समय सदुपयोग करेक तहनि एक मनोरंजन के रुपमें सवानियाँ डोला डारल जिता ।

चारों घइन हरियालि, दुख पिरा भुलाके कुछ समय खुसेलि, हौंसिल्ला के रुपमें फेक सवानियाँ डोला डरना गित बाँस गइना कुछ लोगन कहाइ हे।खास में सावन के डोला डुल्ना एक नारि स्वतंत्रता के प्रतिक फेक आहे काहिक कि बहुत से नमा नमा वेह होइल लौणीयाँ/लौरिया जब ससुरार ति लइहर आइतियाँ तब अपना दुख पीडा गित के माध्यम ति व्यक्त करना संघे संघे अपना दादा भइयाक सुख समृद्धिक, लम्बा जीवनके तहनि बरत बैठना चलन फेक आहे।

धार्मिक कारन कहा जाए तो भग्मान श्री कृष्ण जब शेष नांग वहके बन्दि बनाइले रेहेँ। तब उही प्रतिक के रुपमें डोला के लसरि नांग बाइब के लसरि ति डोला डारल हे जो पचइयाँ (नांग पन्चमि) क दिन छोडके सम्मान के संघे पुहाइल जिता । दुसरा कारन इ हे कि प्राचीन (बहुत पुरान)समयमें नांग (विसहर) भर अपना बहिनि वहके खुसि बनाइक तहनि अपने स्वयम डोलाक पगाहा लसरि बनके डोला डुलाके अपना बहिनिए खुसि करेक तहनि डोला डरले रेहेँ ज़उन कि सावन के महिनाक दिन रेहे उहि मारे सावन के डोलाक सुरुवात होइल कहन बात पुरखाभर बतइतियाँ ।

नारि स्वतंत्रता के पाबुनि सावन डोला उत्सव पहिले हर कठरिया गाउँमें डोला डारेँ आउ डोला डोल के मनोरंजन होबे संघे कठरिया गित संगित के चचड रेहे मुल पाछे पिढ़ि इ सावन डोला डरना संस्कार उरबाइत जाइत हे । एक समय रेहे डोला डोलत कतना सुहावान लागे आज उ नाइ आहे ।

बस नाम के मात्र रहिगेल आहे । विगत ३०-४० साल पहिले डोला डोलत आइत आज सायद हि आज के नमा पिढ़ि दिखले होबे ।यहका कमि कमजोरि पता लगाके अब फेर ति सुरुवात करना समय आइगेल आहे आउ समय के माँग फेक आहे । आज के दिन गणतंत्र व्यवस्थामें स्थानिय सरकार ,प्रदेश एवम् केंद्र सरकार फेक स्थानिय विभिन्न जात जातिक भाषा, कला संरक्षणके तहनि अग्रसर होइत हे ।

अब हमके फेक स्थानिय सरकार के मदत लइके सवानियाँ डोला जइसन कठरिया पहिचान ति जुडल उत्सव, पबनिक सुरुवात करेक आवस्यकत हे जो हम्मर पहिचान केल नाइ भविस्य निरधारन करि । अन्त में सक्कु कठरियाबंधु, सुभचिन्तक, पधना, भलमनसा ति विन्ति हे कि अब सब जाना जागि आउ डोलाके संघे अपना चालचलन रित केहें बचाइक अभियानमें सहभागि होइ ।

लेखक कठरिया सन्देश डटकमके ब्यवस्थापक, सम्पादक हैं ।

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