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कठरियन बन्ना पबनि पचैंयाँ

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अर्जुन कठरिया, १६ सावन ।। सावन महिनाक उज़ेरिक पंचमि दिन हर साल परता पचैंयाँ पबनि । पचैंयाँ अर्थात नागपञ्चमी जौन हर एक हिन्दू धर्मालम्वी मनैतियाँ । कठरिया समुदाय इहि नागपञ्चमी वहके पचैंयाँके नाम मनइता जउनकी सावन महिनाक उज़ेरिक पञ्चमीक दिन परता । कठरिया समाज़के पाँच पबनिमें पचैंयाँ सबति बन्ना पबनिक रुपमें रहल हे।

सबति बन्ना पबनि पचैंयाँ पाँच पबनि महति सबति पहिले अइता जेहके कठरियाभर पचैंयाँक नाउँ ति मनैतियाँ । पचैंयाँ पबनि खासमें कठरियाभर अपना पारम्परिक रुप ति मनैतियाँ । यि पबनिक दिन खासमें विसहर अर्थात साँप (नाग) दिउँताक पूजा हुइता ।

विसहरके पूजा उ घरानामें हुइता जेहका दिउँता विसहर/नाग रहतियाँ । पचैंयाँक दिन जउन घरका दिउँता विसहर रहता ते घरका जानल पुरखा मनैभर भिन्हीं ती खोर खारके बरत रहतियाँ । भुंईयाँ में रहल दिउँता में नमा कोरे माटि लइके पडोरल (परोरल) जिता संघे विसहर/नाग के प्रतिक खैरिक कठ्ठा नाग बनाके घरका भुंईयाँक दख्खिन पाँजर गाडल जिता ।

पुजा करत समय दुध, घिउ, कन्डिक अगेरि, पक्कि रोटि खिर चढा के पुज़ल जिता । पक्कि रोटि नमा कोरे पिसान पिसाके दिउँतन चढाइल जिता । पुजा करल पाछे खिर, पक्कि रोटि अपना घर गुत्तेर-कुरमा, नाँतपातन सबके परसाद के रुपमें बाँटल जिता । सबेरे पुजा करके उराइल पाछे सावन में परल डोलामें गुडरि/गुररि लत्ता कपडा गुडिया बनाके डुलाइल जिता ताकि नाग भरिन जो बहिनी रेहे वहका गुस्सा सान्त करेक तहनि आउ सम्मानजनक विदाइ होबे आउ गाउँमें कुइ रोगदोख नलागे, बालबच्चा निकेमाके रेहेँ ।

जो सावनके डोला हे खास विसहर /नाग के लसरिक प्रतिकके रुपमें बनकस आउ कुस मिलाके बनाइल लसरिक डोला रहता।पचैंयाँक दिन दुपाहर पाछे खोलल जिता । जउन कि नमा वेह होइल लौंणियाँ/लौरिया के संघे जमान लौंणियाँ/लौरियाभर बरत बैठके गुडरि/गुरिरि बनाके साथमें घुघरि परसाद बनैतियाँ ज़उन कि गुडरि/गुररि आउ डोला पुहाके परसाद बँटतियाँ ।

धार्मिक पक्ष ति दिख्बोत कृष्ण लिला में जब भग्मान श्री कृष्ण जब गेंद खेलत रेहेँ तब उ समय गेंद जमुना लदियमें जा के गिरल।उहि गेंद निकारे जब कृष्ण पुग्ने तब हुँवा रहल कालि नाग बन्दि बनाके ति लड़के गेंद निकरने आउ नाग के लसरिक डोला डुल्ने कहाइ हे।

ऐतिहासिक रुपमें कहा जाए तउ प्राचिन भारतवर्ष में नागवंसि राजा भरिन ससान रेहे ११५ इसापुर्व ति ४० इसापुर्व लक उहि समय यूरेसिया ति आक्रमणकारी आर्य लोग आइने ओइन संघ नागवंसि राज़ाभरिन भिसण लड़ाइ होइल आउ एक सदयंत्र के मारफत ओइन राज्य हड़प लहल गेल ।

इतिहासमें बर्नन अनुसार उ समयके सक्तिसालि राज़ा शेषनाग, वासुकि, तक्षक, करकोटक आउ ऐरावत रेंहें। नाग् वंसि गुस्सा सान्त करेक तहनि आर्यभर पाँचो नागृज़भरिन प्रतिक के रुपमें नाग्पुज़ा के प्रचलन सुरु करने । जेहके हमरे नागपंचमी व पँचइयाँ के रुपमें सावन के उज़ेरिक पंचमिक दिन गुडरि/गुररि ,विसहर के पुजा करके मनइति ।

पचैंयाँक रोज़ लौंणा/लौरा भर राडा /रारा घाँसके पटाकी बनाके बजइतियाँ जबकि लौणीयाँ/लौरिया भर गुडरि/गुररि पुहैतियाँ । इ करना क खास मानता हे कि जो घर, गाउँमें रहल दुख कस्ट हे उ चल जाबे आउ गाउँ में सुख शान्ति रेहे।

लेखक कठरिया सन्देश डटकमके ब्यवस्थापक, सम्पादक हैं ।

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